Sunday 16 November 2014

आवारा लड़का

आईये आपका पुनः स्वागत है कट टू कट के इस नए लेख पर , अब तक की मेरी रचनाएँ हमारे दैनिक जीवन की उठा पटक को देख कर लिखी गयी है जिनमे मेने थोड़ा व्यंग्य का नमक भी छिड़का है।  आज संभवतया पहली बार यह एक कहानी नुमा लेख आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ जो की "फिक्शन" की श्रेणी में आता है जिसका शीर्षक है "आवारा लड़का "। आशा है आप इसे भी पसंद करेंगे। 

यह कहानी है एक १७ साल के किशोर की, जो अपने जीवन के उस दौर में है जहाँ हमें कोई एक राह चुन कर आगे बढ़ना होता है , समाज वाले इस उम्र को "कच्ची उम्र" भी कहते है क्योंकि अभी तक जीवन रूपी घड़े की मिटटी कच्ची ही होती है इसके बाद इसे जो रूप देदो वो रूप अख्तियार करके जीवन आगे बढ़ जाता है। यह कहानी है गोलू की। 



गोलू, बी. कॉम प्रथम वर्ष का छात्र है, इसका ज़्यादातर समय अपने दोस्तो मे इधर-उधर की सम-सामयिक चर्चाएँ करने मे गुजरता है, एक 17 साल का किशोर किस तरह की सम-सामयिक चर्चाओं मे व्यस्त रहता होगा इसका बखान करने की शायद आवश्यकता नहीं है, यह वो उम्र होती है जब इंसान के शरीर और मस्तिष्क पर "क्यूरीयोसिटी" नाम का वाइरस अपना क़ब्ज़ा जमा चुका होता है और गाहे-बगाहे दीमाग के किसी शांत पड़े कोने मे कुलबुलाता रहता हैं| अक्सर जब यह कुलबुलाता है तो इसे शांत करने के लिए इंसान कई तरह के इलाज के पीछे भागता है, वैसे सबसे सस्ता और कारगर इलाज है दोस्त।   जी हाँ  मन मे जो भी विकार हो, कोई कुलबुलाहट हो, सीधा जाके अपने दोस्तो से डिसकस करो, सारे वाइरस एकदम शांत हो जाते है| दोस्त या तो आपको सटीक तरीका बता देंगे जिससे सारी कुलबुलाहट मिट जाए, या फिर उस वाइरस को दीमाग के एक कोने से दूसरे कोने मे शिफ्ट कर देते है, और इसी प्रक्रिया मे थोड़ी देर के लिए सही, हमारा "क्यूरीयोसिटी"  वाइरस शांत रहता है|

बहर-हाल बात करते है गोलू की, गोलू ने अपनी कक्षा 12वी तक की पूरी पढ़ाई मोहल्ले के  "गवर्नमेंट बॉय्स उ. मा. विद्यालय" से ही पुरी की है, और उसके ज़्यादातर दोस्त भी उसी स्कूल से पास/फैल/आउट होके निकले है। गोलू के आधे से ज़्यादा दोस्तो को सितारो से जडीत मार्क-शीट मीली, और उन्होने इधर-उधर ट्राय करने के बाद अपने पिताओ के घरेलू व्यवसाय संभालने शुरू कर दिए|
परंतु गोलू थोड़ा ख़ुशनसीब निकला और ठिक-ठाक अंको से स्कूल कि दहलीज पार करने का सर्टिफिकट लेकर अब कॉलेज जाने लगा है। उसके नये नये दोस्त भी बने है , पूरी 100% पुरुष मंडली। शुद्ध रूप से लडको के स्कूल से पढकर आने वाले विद्यार्थी के लिये सबसे आसान काम होता है “बॉय्स ओनली ग्रूप बना लेना और फिर उस लडके कि जम्के खींचायी करना जो भुले से भी कन्याओ कि मंड्ली मे शामील हो गया हो। या यूँ कह लीजिए की अंगूर खट्टे के खट्टे ही रहते है|

अभी कॉलेज की ख़ास बात यह है की यहा गोलू के सिर्फ दीमाग मे ही वायरस छट्पटाता है आँखों मे कोई वाइरस नही कुलबुलाता, क्योंकि को-एड कॉलेज मे दाखिला लिया था, इसीलिए आँखें ठंडक पाने को कम ही तरसती थी|
गोलू और उसकी मंडली ज़्यादातर अपना समय ऐसी जगहो पर बीताते है जहाँ कन्याओ के झुंड का आना जाना ज्यदा होता हो।
 खैर अब तक यहाँ गोलू के बारे में जो कुछ भी बताया गया है उसको सुन पढ़ कर आपके दिमाग में उसका चरित्र चित्रण हो चूका होगा, यह सामान्य इंसानी बिमारी है की हम किसी के बारे में कुछ सुनते पढ़ते है तो उसके बारे में वैसी ही धारणा बना लेते है। 
वैसे गोलू आसानी से किसी का कहना नहीं सुनता परन्तु अगर बाइक पर कही जाके कोई काम करवाना हो तो आप बेझिझक गोलू को कह सकते है। मसलन, पड़ौसी शर्मा अंकल को सुबह सुबह ६ बजे उठकर रेलवे स्टेशन पहुचाना हो, बड़ी बहन को उसके कॉलेज छोड़ कर आना हो, पास वाली भाभी को बाजार लेके जाना हो या पीछे की गली में रहने वाली सलमा आपा को ब्यूटी पार्लर लेके जाना हो, गोलू बिना कोई झिक झिक किये इन सब का काम कर देता है। 
आज ही गोलू के घर में किरायेदार आंटी ने कहा "अरे गोलू भइया, आप कोचिंग जाओगे न, तो रास्ते में ही हमारी मौसी का घर पड़ता है, थोड़ा छोड़ दोगे क्या हमको ?" गोलू ने तपाक से कह दिया " अरे आंटी थोड़ा क्या आपको पूरा का पूरा वहां छोड़ दूंगा " ठहाके गूंजे और थोड़ी देर में गोलू अपनी बाइक पर आंटी को बिठा के निकल पड़ा। 

गोलू ने अपना बी.कॉम  प्रथम वर्ष पूरा कर लिया इसी तरह, देश में जिस तरह बारिश की कमी रही उसी तरह गोलू की मार्कशीट में भी थोड़ा सुखा पड़ा इस बार, परन्तु पास जरूर हो गया। 
गोलू की जिंदगी इसी तरह अब भी चल रही है, पास वाले चौहान अंकल से लेके पड़ोस वाले पटेल काका तक सब का कोई न कोई काम करता आ रहा है (बशर्ते उस काम में बाइक की आवश्यकता हो ना की बल की )

आईये अब आपको लेके चलते है इन्ही पड़ौसियों के घर, पास वाली शर्मा आंटी आज अपने बेटे को डांट रही थी "पढ़ ले थोड़ा, बैठ के किताब खोल लिया कर नहीं तो वो गोलू जैसा आवारा बन के घुमा करेगा इधर उधर " 
गोलू की बाइक पर अक्सर बाज़ार जाने वाली भाभी आज सलमा आपा से मिली तो कह रही थी की आज तो पुरे १० रुपये खर्च करके बस से बाजार जाना पड़ा नहीं तो वो आवारा गोलू छोड़ ही देता है हमेशा। पड़ोस वाले शर्मा जी को उनका सहकर्मी ट्रैन में बता रहा था की किस तरह उसको ऑटो वाले ने लूटा, तभी शर्मा जी बोले "यार अपना तो बढ़िया है , पड़ोस में एक बेवकूफ़ किसम का लड़का रहता है उसको जब बोलो तब बाइक लेके आ जाता है और स्टेशन छोड़ जाता है।"

गोलू को उसके अपने घर में भी कोई सीरियसली नहीं लेता है, वो अपने खुद के घर में भी एक "आवारा लड़के" की पदवी पा चूका है। 
 

Sunday 26 October 2014

ईयर एंड क्लोजिंग

ईयर एंड क्लोजिंग 

"Well done guys, this year we have over-achieved our year end target and we all hope to begin this new year with grand opening as we have a change of season advantage."

ऐसा कहते हुए माइक पर थोड़ा खाँसकर अंतर्राष्ट्रीय  रोगाणु  समिति के चेयरमैन श्री झींगा वायरस पानी पिने लगे।  दर-असल आज विक्रम सम्वंत २०७१ की शुरुआत में सारे विश्व से आये रोगाणु , विषाणु , बैक्टीरिया इत्यादि के प्रतिनिधियों के साथ चेयरमैन साहब की अहम बैठक रखी गयी है। 

बैठक अपने पठान साहब के गैराज में रखी है , जहाँ गाडी को छोड़कर आपको तमाम चीजे मिल जाएगी, मसलन एक कोने में पड़ा हुआ पुराना कूलर जिसके टैंक में अभी भी पानी सड़ रहा है, उसी के बाजु में रखा एक फ्लॉवर पॉट जिसमे फ्लॉवर का फ़्लेवर तक नहीं मिलेगा बल्कि दुनियाभर का गीला कचरा उसी में पड़ा मिलेगा और चूँकि यह गैराज खुला ही रहता है तो आसपास से उड़ कर आने वाला तमाम प्रकार का कचरा भी जमा है इसमें। कुल मिलाकर इस मीटिंग के लिए इस गैराज से उपयुक्त जगह कोई हो ही नहीं सकती थी। 

"झींगा साहब कितने अच्छे है न, कितनी बढ़िया जगह मीटिंग रखी है, सफाई का कोई खतरा नहीं है यहाँ " डेंगू वायरस के प्रेजिडेंट ने मलेरिआ प्रेजिडेंट से कहा, बाकी के जीवाणुओ की भी खुसर फुसर चालू ही थी की इतने में चैयरमेन साहब ने एक और अनाउंसमेंट किया , " सभी रोगाणुओं बंधुओ से अनुरोध है की सब अपनी अपनी जगह पर शांत बैठे रहे, अभी थोड़ी देर में हम अपने ईयर एंड क्लोजिंग की फुल रिपोर्ट पेश करेंगे। हमारे पास देश और दुनिया के सारे रिकार्ड्स पहुंच चुके है। "

"लेकिन सबसे पहले में बधाई देना चाहूंगा हमारे एसोसिएशन के नए सदस्य का, जिन्होंने हाल ही में बड़ी धमाकेदार एंट्री मारी है जिससे पूरा विश्व हिल गया है, और आज तक सभी बड़े से बड़े देश खौफ में जी रहे है।  जी हाँ दोस्तों में बात कर रहा हूँ सारी दुनिया में कुप्रसिद्ध और कुख्यात वायरस एबोला की .......... " बात खत्म होते होते पुरे हॉल में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी , हर छोटे मोटे वायरस को लगने लगा की वो भी एक दिन ऐसा बड़ा कारनामा कर सकता है , चारो और फिर से एक बार खुसर फुसर शुरू हो जाती है। 

प्रेजिडेंट ऑफ़ HIV एक कोने में खड़ा होक एबोला की तारीफ सुनकर जलभुनकर ख़ाक हो रहा होता है तभी पीछे से V.P ऑफ़ स्वाईन फ्लू आके उसको सांत्वना देता है की "ऐसा तो होता रहता है , परसो तुम फेमस थे कल में और आज यह एबोला", बर्डफ्लू का डायरेक्टर भी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहता है "same to same ". 

"Silence Please" फिर से चैयरमैन साब ने माइक संभाला "और अब मुझे आप सभी को यह बताते हुए बड़ा हर्ष हो रहा है की  भारत देश में हमने इस बार भी तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए  अच्छा प्रदर्शन जारी रखा है।  हमारा टारगेट पूरा करने में कई शहरों के म्युनिसिपालिटी  ने और वहाँ के बेवकूफ इंसानो ने हमारी बड़ी सहायता की है। " किन्तु पिछला एक महीना हमारे लिए थोड़ा संकटमय  गुजरा है , जब से भारत के P.M  मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की है  तब से लेकर आज तक हमारे करोडो साथी शहीद हुए है और हमारे आंकड़ों पर भी इसका असर पड़ा है।  परन्तु मुझे इस देश के  इंसानी मूर्खों पर पूरा भरोसा है की वो अपने P.M की बातों में इतनी आसानी से नहीं पड़ने वाले  और हमें पाल के रखेंगे अपने आसपास। "

"अभी जैसा की आप सभी जानते है की चेंज ऑफ़ सीजन चल रहा है जो की हमारे बिज़नेस का सबसे अनुकूल समय है , इसी समय में हम ज्यादा से ज्यादा टारगेट पूरा कर सकते है तो आप सभी को नयी टारगेट लिस्ट दे दी जाएगी, आशा है आप उसे जरूर पूरा करेंगे। " 

"अंत में हम सब मिलकर स्वच्छ भारत अभियान में शहीद हुए अपने साथियों को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे और दावत -ए -कचरा का लुत्फ़ उठाएंगे। "

भाषण ख़त्म होते ही सब के सब जोर से एक नारा लगाते है 
"जब तक कूड़े का ढेर रहेगा । 
रोगाणु समुदाय अमर रहेगा ॥ "


चित्र इंटरनेट के सौजन्य से 


Thursday 11 September 2014

अजन्मे का संकट


आज बड़े दिनों बाद ऐसा हुआ की में सूरज ढलने  से पहले ही ऑफिस का  काम निपटा के घर पहुँच गया। मुझे समय से पहले ही दरवाज़े पर खड़ा पाके मेरी बीवी बड़ी खुश हुयी।  जी साब हम आईटी वालो के जीवन का घडी से कोई लेना देना नहीं होता, कब उठे, कब तैयार हुए, कब ऑफिस पहुँचे और फिर कब घर लौटे, इन सब का समय से कोई वास्ता है ही नहीं ।

पत्नी के मुखमंडल पर मिश्रित सी भावभंगिमा देखकर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ, परन्तु वो बड़ी खुश हो गयी।
पत्नियां भी अजीब होती है ( सभी को पता है , कोई नयी बात नहीं ) कभी कभी कोई बड़े से बड़ा काम भी करो या कोई बड़े से बड़ा उपहार भी लाके दो तब भी खुश नहीं होती, और कभी छोटी छोटी सी बातों में ही खुश हो जाती है , जैसे की अभी मुझे समय से पहले अपने सामने पाकर मेरी पत्नी खुश हुयी।

जल्दी से हाथ मुह धोकर मैंने आज बहुत दिनों के बाद शाम की(भी) चाय अपने हाथो से बनाकर अपनी अर्धांगिनी के साथ में बैठकर चुस्कियां मार मार के पी। चूँकि अभी शाम का समय था, बाहर का मौसम भी थोड़ा रोमेंटिक सा हो चला था, सो हमने सोचा क्यों का आज कॉलोनी के बड़े वाले गार्डन में "इवनिंग वॉक " पर चला जाये।  झटपट से तैयार होके हम निकल पड़े।

गार्डन में पहुंच के बड़ा अच्छा लगा, बड़े से गार्डन में  अलग अलग कोने में और बहुत सारे  और हर उम्र के बच्चे खेल रहे थे, दूसरी और कुछ बुजुर्ग अपना प्राणायाम कर रहे थे, एक कोने में कुछ महिलाएं निंदासन कर रही थी।  निंदासन क्या होता है यह तो आपको पता ही होगा।
गार्डन में हम लोग थोड़ा चहल-कदमी करते रहे , में आसपास के यह सारे नज़ारे देखता-सुनता रहा और साथ ही साथ बैकग्राऊँड में मेरी बीवी के  मुख कमलो से निकली वाणी मेरे कानो में बराबर पड़ती रही और में हूँ -हूँ करता रहा।

 कुछ देर चहल कदमी करने के पश्चात् हम लोग मौका देख कर एक खाली बेंच पर विराजमान हुए और मैंने अपनी हूँ- हूँ जारी रखी।  मेरे कानो पर तभी कुछ बुदबुदाने की ध्वनि पड़ी, पास वाली बेंच से ही यह ध्वनि आ रही थी, दर-असल 2 महिलाएं कुछ बातें कर रही थी, एक महिला गर्भवती जान पड़ती थी , और इस बार हमने अपनी पत्नी से आज्ञा लेके  उन दोनों  के संवाद को अपने कानो के ज़रिये दिमाग में रिकॉर्ड कर डाला। और अब वही संवाद सीधा यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। सहूलियत के लिए मेने दोनों नायिकाओं को नाम दिए है उमा और रमा। जिसमे से रमा वो है जो कुछ दिनों में इस धरती पर नया जीवन लाने वाली है , जी हाँ मतलब गर्भवती है।

उमा : अरे रमा तू वो पाउडर ले रही है की नहीं ? जो मेने तुझे दिया था , वो पाउडर खायेगी तो बच्चा  गोरा चिट्टा और तंदुरुस्त पैदा होगा।
रमा : हाँ हाँ दीदी ले रही हूँ न , दिन में ३ बार लेती हूँ वो तो।

उमा : और तू ना सारे रियल्टी शो देखा कर, जिस से तेरा बालक भी टेलेंटेड पैदा होगा , आजकल सब बच्चे ऐसे ही पैदा होते है, पैदाईशी टैलेंटेड।
रमा: अरे हाँ, आप सही कह रहे हो , वो पास वाली बिल्डिंग में मोना को बेटी हुयी ना तो वो सूर के साथ ही रोती है , और लेटे  लेटे ही डांस भी करती है।  उस मोना ने जरूर सारे रियल्टी शो देखे होंगे, मैं भी सारे शो देखा करुँगी, मुझे भी अपने बच्चे को सुपर टैलेंटेड बनाना है।

उमा: और सुन, तेरे पति जब क्रिकेट देखे ना तो वो तू भी देखा कर, आजकल के बच्चे स्पोर्ट्स में भी आगे होते है, तुझे भी अपने बच्चे को   . . . . . . . . .
रमा: अरे दीदी , यह सब में पूरा ध्यान रखती  हूँ,पर इसके चक्कर में मेरे कई सीरियल्स मिस हो जाते है , पर क्या करे बाहर कॉम्पिटिशन इतना बढ़ गया है की मुझे अपने बच्चे के लिए यह सब करना पड़ता है।

इन महिलाओ की यह चर्चा यहीं समाप्त नहीं हुयी थी, की अचानक से मेरे कानो में एक नन्ही आवाज़ गूंजी, बचाओ बचाओ करके . . ..... सीधे रमा के गर्भ से, जी हाँ , इन दोनों की इतनी भयानक प्लानिंग सुन के बेचारा बच्चा चीख पड़ा , की बस करो, मेरे बाहर आने से पहले ही मुझ पर इतना प्रेशर डाल रहे हो तो  बाहर आने के बाद मेरा क्या हाल करोगे।




इतनी बातें सुन कर , में भी सोच में पड़ गया की बीते कुछ वर्षो में हमारे बालको पर माता पिता द्वारा उत्कृष्ट प्रदर्शन करने के लिए इतना दबाव डाला जा रहा है जिसके लिए कहते सुनते सब नजर आते है , परन्तु करता कोई कुछ नहीं। वैसे माता पिता भी इसी दबाव में रहते होंगे की कही उनका बच्चा बाकी बच्चो से किसी विधा में पिछड़ न जाये। परन्तु  इस होड़ में आज के बालको का बालपन कहीं नजर नहीं आता।

आप भी सोचियेगा , की कही यही "कम्पीटीशन " बच्चो को समय से पहले "बड़ा" तो नहीं कर रहा ?
मेरा इशारा तो आप समझ ही रहे होंगे।

में घड़ा हूँ कच्चा, पकने में समय लगने दो  
बड़ा होने की जल्दी नहीं है मुझे  
बच्चा हूँ अभी मैं, मुझे बच्चा रहने दो। । 



नोट : बच्चा और बालक शब्द पढ़ने सुनने में पु:लिंग लगते है , परन्तु हिंदी भाषा में यह शब्द उभयलिंगी (यूनिसेक्स) है। तो कृपया लेख के मूल से भटकने का प्रयास न करे !
चित्र इंटरनेट के सौजन्य से








Friday 27 June 2014

आईटी-सर्विसमैन के जीवन की सरगम


आप लोगो ने संगीत के ७ स्वरों के बारे में तो सुना ही है,  हाँ हाँ वही सा-रे -गा -मा  वाले साथ ही भाषा के स्वरों के बारे में भी आप जानते ही है।

जैसे अंग्रेजी भाषा में ५ स्वर (vowels) होते है,  संगीत में सात सुर होते है वैसे ही बेचारे आईटी-सर्विसमैन के जीवन की सरगम में  भी ५ स्वर होते है। 




अब आप सोचेंगे की क्या अनाप शनाप की ऊल जुलूल बातें करता रहता है, तो आगे पढ़िए और खुद ही निर्णय लीजिये की में क्या कह रहा हूँ।  अगर आप एक सच्चे आईटी-सर्विसमैन होंगे तो जान जायेंगे की मेरी बातों में कितनी सच्चाई है और अगर आप नॉन-आईटी के है तो आपको भी तो पता पड़े की आईटी वालो की लाइफ का कांटा किन ५ चीजो के चारो और घूमता है।

मेने कहा था की अंग्रेजी भाषा के स्वरों(a .e.i.o.u) की तरह ही आईटी-सर्विसमैन के जीवन के भी ५ स्वर है तो आईये शुरू करते है और जानते है इन स्वरों के बारे में।

१.' अ ' या A =Affair 

प्रथम स्वर है A माने Affair, मतलब कोई चक्कर या रास-लीला। जी हाँ जब भी एक फ्रेशर कोई आईटी कंपनी में दाखिल होता है तो या तो वो कॉलेज जमाने से ही कमिटेड स्टेटस में होता या अकेला होता है। कंपनी में दाखिल होते ही पहला स्वर अपने पुरे जोर शोर से इस नए नए आईटी-सर्विसमैन के कानो में गूंजने लगता है।  वो देखता है की कैसे उसकी आँखों के सामने ४-५ जोड़े ऐसे ही  बन गए और वो बस देखता रहा।  उसकी अंतरात्मा उसको धिक्कारने लगती है की कॉलेज के जमाने में तो कुछ बात बनी  नहीं अब तो कुछ कर।  और बेचारा शुरू हो जाता है अपनी अंतरात्मा की ललकार को चुप कराने की कोशिश में।

खैर अब हर किसी का अफेयर हो यह जरूरी भी नहीं कुछ न कुछ कारण या बहाना तो मिल ही जाता है "सिंगल" रहने का।  किन्तु यह प्रथम स्वर गूंजता ही रहता है उम्र भर।

२. 'इ' या "e " :Eatery Points


दूसरा स्वर जो गूंजता है वो हर किसी आईटी सर्विसमैन के कानो को नहीं फाड़ता यह उन लोगो के लिए है जो दूसरे शहरों से आये है।  E माने Eatery Points माने खाने पिने के अड्डे। वैसे एक इंजीनियर के लिए भोजन का युद्ध कोई बड़ी बात नहीं होती, वो हॉस्टल में रहके अच्छी तरह से जान जाता है की "भोजन समझौता" किसे कहते है।  परन्तु जब आप एक नए शहर में नौकरी करने जाते हो, अच्छा खासा पैसा कैफेटेरिया में देते हो और बदले में आपके हॉस्टल के खाने से भी बद्तर खाना मिले तो मन में फ़्रस्ट्रेशन वाली फीलिंग्स आती है तब ये दूसरा स्वर आपके कानो को चीरता हुआ गूंजता है की ढूंढो  कुछ अच्छे Eatery Points.


३. 'ई ' या I : Increment

अब यह मत कहना की यह तो सबसे ज्यादा दुखने वाला स्वर है, वैसे इसके बारे में ज्यादा कुछ लिखने से फायदा नहीं। तीसरा स्वर है I बोले तो इंक्रीमेंट याने बढ़ोत्तरी , जी हाँ सालाना तनख्वा में।  हम हमेशा सोचते है की यह स्वर कभी तो ऊँचा लगेगा, थोड़ा हाई पीच, परन्तु जैसा हम सोचते है अक्सर वैसा होता नहीं है हमारे जीवन में।  यह वाला स्वर सबसे नीचे की और बैठता है और बड़ी धीरे से लगता है। कभी कभी तो इस स्वर से कोई आवाज़ ही नहीं निकलती है।

४. 'ओ '  या O: Onsite 

अब आते है आईटी संगीत के चौथे स्वर पर तो दोस्तों यह स्वर हर आईटी सर्विसमैन लगाने की कोशिश करता है, किन्तु लगता सिर्फ भाग्यशाली लोगो का ही है बाकी तो बस मूह से हवा निकालते रह जाते है।

५. " ऊ " या U : U Turn:

अंतिम और सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और सबसे ज्यादा दुखदायी और सबसे ज्यादा कर्कश स्वर है U-टर्न।
जी हाँ यहाँ बात हो रही है आपके मैनेजर के U-टर्न की , साल के शुरू में आपसे काम लेने के लिए आपको सुन्दर , हसीं सपने दिखाए जाते है फिर चाहे वो सालाना हाइक  हो, ओनसाईट  हो, प्रमोशन हो या प्रोजेक्ट से रिलीज़  हो।  आपको इनमे से कई तरह के प्रलोभन दिए जाते है, वो देता जाता है और आप लेते जाते हो।  असल में होता इसके विपरीत है।  साल के अंत तक जब आप अपने सपनो के वाउचर  को रिडीम करवाने जाते हो तो मिलता है एक तड़कता  भडकता  हुआ सा U Turn. आप फिर से जुट जाते हो काम में इसी आस में की कभी तो यह सिलसिला खत्म होगा।


तो, देखा आपने की एक आईटी सर्विसमैन के जीवन के ५ स्वर इतने आसान नहीं है जितना की दिखाई देते है, संगीत के ७ स्वरों को ठीक से लगाने के लिए जितना परिश्रम करना पड़ता है उससे ज्यादा परिश्रम आईटी के इन ५ स्वरों को ठीक से लगाने में करना पड़ता है।


..................................................चित्र गूगल महाराज के सौजन्य से 

Monday 2 June 2014

एक रेल यात्रा और २ स्मरणीय नाम

एक रेल यात्रा और २ स्मरणीय नाम

बात १९९० की गर्मियों की है, में और मेरी मित्र भारतीय रेलवे सेवा के प्रशिक्षु के तौर पर लखनऊ से देल्ही तक का सफर कर रहे थे।  हमारी ही बोगी में २ सांसद भी सवार थे जिनसे हमे कोई परेशानी नहीं थी, परन्तु उनके साथ यात्रा कर रहे उनके १०-१२ साथियो ने बड़ी ही बदतमीज़ी से हमसे बात की। उन लोगो ने हमारी आरक्षित सीट से ही हमें उठा कर खुद सवार हो गए ,  और तो और भद्दी भद्दी टिप्पणियाँ भी करते रहे। उस बोगी में कोई भी यात्री या टिकट चेकर हमारी सहायता करने आगे नहीं आया। हम लोगो ने भय युक्त वातावरण में जैसे तैसे रात गुजारी। 

अगले दिन सुबह हम डेल्ही पहुंचे, तथापि उन गुंडों ने हमें कोई शारीरिक क्षति तो नहीं पहुचाई परन्तु मानसिक रूप से हमें बहुत आघात पंहुचा था।  मेरी मित्र को तो इतना गहरा सदमा पंहुचा था की उन्होंने प्रशिक्षण का अगला चरण टालना ही उचित समझा जो की अहमदाबाद में होना था।

मेने अहमदाबाद जाने का निर्णय किया क्योंकि एक और प्रशिक्षु मेरे साथ यात्रा करने वाली थी। इस बार हम आरक्षण नहीं करवा पाये और वेटिंग का टिकट लेकर ट्रैन में चढ़ गए।  प्रथम श्रेणी के कोच में TTE  से हमने बात की और समझाया की हमारा अहमदाबाद पहुचना कितना जरूरी है, वो हमें एक द्विशायीका (कंपार्टमेंट ) में लेके गया और बैठ कर कुछ देर इन्तेजार करने को कहा। मेने अपने संभावित सह-यात्रियों की और देखा जो की अपने परिधानों से किसी राजनैतिक पार्टी के नेता ही लग रहे थे। मुझे अपनी पिछली यात्रा का संस्मरण हो आया और मेरी भाव-भंगिमा से मेरे भीतर की घबराहट मेरे मुख पर स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी। TTE ने मेरे चहरे के भाव पढ़कर मुझे आश्वस्त किया की ये लोग सभ्य और  नियमित यात्री है। 

उनमे से एक कुछ ४० पार रहा होगा और दूसरे की उम्र कुछ ३५-४० रही होगी। उन लोगो ने ख़ुशी ख़ुशी हमारे लिए बैठने की जगह बनाते हुए खुद को एक कोने में समेट लिया। उन दोनों ने अपना परिचय गुजरात के भाजपा नेताओ के रूप में दिया, उन्होंने अपने नाम भी बताये मगर नाम हम याद नहीं रख पाये, हमने भी उन्हें बताया की हम आसाम से रेलवे सेवा के प्रशिक्षु है। हम लोगो ने कई विषयों पर बातचीत की, विशेषकर इतिहास पर। मेरी मित्र ने इतिहास में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त कर रखी  थी सो उसने बढ़चढ़ कर चर्चा में हिस्सा लिया, मेने भी बीच बीच में भाग लिया। नेताओ में से जो वरिष्ठ थे उन्होंने ने उत्साह के साथ चर्चा में अपनी हिस्सेदारी दिखाई जबकि दूसरे नेता ने सुनने में अधिक रूचि दिखाई। 

बातो के बीच में मेने श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु का जिक्र किया की कैसे उनकी मौत आज तक एक रहस्य बनी  हुयी है।  कनिष्ठ नेता जो की अब तक बगैर ज्यादा कुछ कहे सिर्फ सुन रहे थे, अचानक बोले : "आप श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बारे में कैसे जानती है ?", तब मेने उन्हें बताया की किस प्रकार से उन्होंने मेरे पिताजी की पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति का इन्तेजाम किया था। 

अचानक से वरिष्ठ नेता ने हमसे कहा , "आप लोग गुजरात में हमारी पार्टी क्यों नहीं ज्वाइन कर लेते ?" हमने जोर का ठहाका लगा के कहा की हमारे बस का ना है और वैसे भी हम गुजरात के नहीं है , तभी छोटे नेता ने कहा : " तो क्या फरक पड़ता है अगर आप आसाम से हो, हमारे यहाँ प्रतिभावान लोगो का स्वागत है ", यह  कहते वक़्त उनके शांत गंभीर चेहरे पर एक चमक सी साफ़ नज़र आ रही थी। हमे प्रतीत हुआ की ये सिर्फ कहने की बात नहीं थी , बल्कि वो लोग गंभीर थे। 

खाना आ चूका था, ४ शाकाहारी थालियां।  हम चारो ने शांतिपूर्वक भोजन किया और जब पेन्ट्री वाला पैसे लेने आया तो छोटे वाले नेताजी ने पूरा भुगतान स्वयं किया।  मेने धीरे से धन्यवाद दिया, उन्होंने सीधे तौर पर दरकिनार करते हुए कहा की इतनी छोटी बात के लिए कैसा धन्यवाद।  उस समय उनके आभामंडल पर जो चमक थी वो देखने लायक थी।

 इतने में TTE  ने आकर हमें सीट की अनुपलब्धता के बारे में जानकारी देकर अपनी असमर्थता ज़ाहिर की और कहा की कुछ और इन्तेजाम नहीं हो सका।  इतना सुनते ही वो दोनों नेतागण तपाक से बोल पड़े की चिंता करने की कोई बात नहीं है हम व्यवस्था कर देंगे। उन्होंने बड़े आराम से निचे फ्लोर पर चादर बिछाई और सो गए और हमने उन लोगो की सीट पर कब्ज़ा जमा लिया। 

पिछली ट्रैन यात्रा और इस यात्रा में कितना बड़ा अंतर था, एक तरफ उन राजनेताओ का झुण्ड जो सभी सह-यात्रियों से बदतमीज़ी कर रहे थे और एक तरफ यह २ नेता जिनके साथ हमे पूर्ण सुरक्षा का अनुभव हो रहा था। अगली सुबह जब ट्रैन अहमदाबाद के करीब पहुंची तो वरिष्ठ नेता ने हमसे हमारे रहने के प्रबंध के बारे में पूछा और अपना पता बताते हुए कहा की कुछ भी समस्या हो तो हम बेझिझक उनके घर जा सकते है, छोटे वाले नेता ने कहा की मेरा तो अहमदाबाद में कोई ठौर ठिकाना नहीं है , परन्तु आप लोग इनका निमंत्रण स्वीकार कर सकते हो और कोई भी परेशानी हो तो बता सकते हो, हम हर संभव सहायता की कोशिश करेंगे। 

 यह सब बातें करते वक़्त उन दोनों के मुख पर एक गंभीरता और आशावान चमक थी। हमने अपने रहने के प्रबंध के बारे में उन्हें आश्वस्त किया और निमंत्रण के लिए उन्हें सहृदय धन्यवाद दिया।  

इससे पहले की ट्रैन  स्टेशन पर रूकती और हम लोग उतर कर अपने अपने गंतव्य की और प्रस्थान करते मेने अपने बैग से अपनी डायरी और पेन निकलते हुए उन दोनों से अपने अपने नाम लिखने का आग्रह किया। क्योंकि में उन दो विशाल ह्रदय वाले नेताओ का नाम नहीं भूलना चाहती थी जिन्होंने नेताओ के प्रति मेरे पूर्वाग्रह को एक अलग ही दिशा प्रदान की थी। 

उन्होंने डायरी लेकर एक -एक करके अपना नाम लिखा , उम्र में बड़े दिखने वाले नेता ने लिखा शंकर सिंह वाघेला और छोटे नेता ने लिखा नरेंद्र मोदी। 

यह पूरा घटनाक्रम मेने १९९५ में एक असमीज़ समाचार पत्र में लिखा था, यह उन दो गुजरती नेताओ के प्रति मेरी आदरांजलि थी जिन्होंने निस्वार्थ भाव से हम दो असमिया बेन  के लिए इतना कुछ किया था।  By Leena Sarma
(The author is General Manager of the Centre for Railway Information System, Indian Railways, New Delhi. leenasarma@rediffmail.com)

नोट: प्रस्तुत लेख अंग्रेजी समाचार पात्र "द  हिन्दू " में १ जून २०१४ को प्रकाशित हुआ था , उसी का हिंदी अनुवाद मेने यहाँ प्रस्तुत किया 

 अंग्रेजी में पढ़ने के लिए निचे दिए लिंक पर जाये :



Thursday 15 May 2014

Dream Bollywood Government


Government is being formed in India, we have voted for our favorite party/candidate. Now Political parties are keen on forming government, everywhere in India politics is flowing, how boring na ??

So leave that work on political parties, lets discuss Bollywood. Considering the second most interesting thing in India after Cricket Bollywood has it's own charm. 
Imagine if we have to chose our government from the mass of Superstars of Indian film industry, how would it be ?

So I have prepared my dream Bollywood government as follows:


1. Prime Minister
If I had to chose our PM from film industry, and at the same time we talk about Power, persona and acceptability then the only name emerges which is none other that our Rajini Sir




2.Finance minister
The way he is managing his finances in his 70s, the way he stood again once failed, and the way he is still earning crores every year when his son is failed, Our finance minster should be Amitabh Bachchan.



3. Defense Minister
Now this I can leave on your imagination, and I know that here I will match with your pick. Considering the number of movies done by him against Pakistan or to save India he is the definite choice for Defense minister of India. 




4.Minister of women and child affairs
In this country if some one has given more jobs to women than anyone else then she is surely Ekta kapoor.
She kept busy most of the women not only in Prime time, but the killing noon time. So for this ministry Ekta Kapoor is the perfect choice.





5. Foreign Minister
If Yash Chopra was alive today, he would have been the first one to given mandate for this ministry. In absence of Yash jee, we can give this job to Karan Johar. He is good at negotiation, good at communication, good at keeping friends with two mutual enemies. Considering all these qualities, he can be the best Foreign minister.  




6. Health Minister
For this post, we have a tough fight between Jitendra and Salman (since Amitabh jee already given Finance ministry, he is out of this race). So based on the current popularity and health conditions, the one who has motivated a lot of youth of India for a better health is none other than Salman Khan.




7. Education Minister
This job is not only tough but very challenging in a country like India. In Bollywood I can find only person who can do justice to this job is one who has educated people that humanity is bigger than anything else, he has demonstrated that how entertainment can be mixed with education. 
Yes I am talking about Rajkumar Hirani.



8. Railway Minister
Considering his obsession with Trains (DDLJ, Dil se, Chennai Express etc), who else you can think for this job. So obviously Shahrukh khan will be handling out railway ministry.



9. Home minister
Home affairs to be dealt with emotions, love and caring. Home affairs should be considered as family affairs and handled in that way. So give me a name who is good at family bonding, good at family affairs ? 
yes, the one and only Suraj Barjatya.



and the last but not the least





10. Textiles Minister
If I give my money bag to a person who doesn't need money then my money will be safe, right. So giving that logic my best preference for textile minister is another Sunny.



Waiting for your dream cabinet from Bollywood .......


Thursday 1 May 2014

आईटी सर्विसमैन की भोजन गाथा


राहुल अपने हाथो में थाली लिए खड़ा है, अपनी दूर कि और पास कि नजरो से पुरे हॉल का निरिक्षण कर रहा है।  उधर से काव्या भी आ गयी वो भी अपनी बड़ी बड़ी गोल गोल आँखों को घुमा घुमा के इधर उधर देख रही है। इतनी देर में ६-७ युवा दोस्तों का एक और झुण्ड भी आ पंहुचा है , और सभी अपने अपने हाथो में प्लेट्स लिए खड़े हुए है।

अब अगर आप सोच रहे है कि यह दृश्य किसी शादी या बर्थडे पार्टी या किसी बुफे रेस्टॉरेंट का होगा आप थोडा सा गलत सोच रहे है। दर-असल यह दृश्य हमारे ऑफिस के कैफेटेरिया का है।

एक आईटी सर्विसमैन के जीवन मे भोजन का संघर्ष किसी युद्ध से कम नहीं होता है।  वैसे बहुत से लोग तो ४ साल हॉस्टल में रहके इस भोजन युद्द मे महारत प्राप्त किये होते है।  अब कैफेटेरिया का खाना हाथ मे लेकर बैठने के लिये एक टेबल ढूंढ़ना नयी मुसीबत।

दोपहर १ से लेकर ३ बजे तक यह दृश्य किसी भी आईटी कंपनी के कैफेटेरिया में देखा जा सकता है। लोग  हाथो में अपनी अपनी प्लेट्स और टिफ़िन के डिब्बे लिए एक टेबल से दूसरी टेबल ताका -झांकी  करते हुए अमूमन दिखाई पड़ेंगे। सबसे पहले तो देखते है कि कहा टेबल खाली है, फिर उस तक जल्दी से पहुचने कि कोशिश करेंगे, जैसे ही टेबल के करीब पहुचे तो पता पड़ा कि दूसरी और से किसी और ने आके अपना डिब्बा टेबल पर रखते हुए आपकी और देख के कंधे उचका के कह दिया सॉरी।
फिर आप दूसरी टेबल कि आस में इधर उधर ताकना शुरू करते है, और पाते है कि कोई टेबल खाली नहीं है, मतलब अब समय है पहले से बैठे हुए लोगो कि थालियों में नजर दौड़ाने का, कि किसकी थाली पहले खाली होने को है।  आप सबसे कम खाना नजर आने वाली थाली कि टेबल के पास जाके खड़े हो जाते है|
बेशर्मी कि हदों को लांघते हुये आप सतत रूप से टेबल पर बैठे व्यक्तियोँ के हर एक निवाले पर नजर गड़ा  कर रखते है और जैसे ही अन्तिम व्यक्ति अपणा अन्तिम निवाला मूह मे रखता है आप  टेबल से चिपक के खड़े हो जाते हो और अपना टिफ़िन या प्लेट ऐसे रखते है जैसे हिमालय कि चोटी पर झन्डा गाड़ दीया हो।



 भोजन मनुष्य के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, आखिरकार हम  सारी मेहनत मशक्कत  पेट भर भोजन के लिए ही तो करते है। किन्तु कई बार भोजन को प्लेट तक पंहुचने मे जितना समय नही लगता उससे ज्यादा समय इसे  हमारे पेट तक पहुचने मे लग जाता है।


देश भक्ति

  देश भक्ति , यह वो हार्मोन है जो हम भारतियों की रगो में आम तौर पर स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस  या भारत पाकिस्तान के मैच वाले दिन ख...